"God Kabir - The Real God" (कबीर साहिब) 


Creation of Nature - Kabir Vani

धर्मदास यह जग बौराना। कोइ न जाने पद निरवाना।।
यहि कारन मैं कथा पसारा। जगसे कहियो एक राम नियारा।।
यही ज्ञान जग जीव सुनाओ। सब जीवोंका भरम नशाओ।।
अब मैं तुमसे कहों चिताई। त्रयदेवनकी उत्पति भाई।।

In the aforesaid sacred speech, God Kabir Sahib Ji is saying to His disciple, Shri Dharamdas Sahib Ji that Dharamdas, this whole world is perplexed because of lack of the true knowledge.
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Kabir Vani on Guru and Naam

Kabir Sahib

कबीर, हरि के नाम बिना, राजा रषभ होए।
माटी लदै कुम्हार कै, घास ना डाले कोए।।6।।

Kabir Sahib is saying that without the name of God, a king will become a donkey where a potter will make him work endlessly and no one will offer him food (grass).

कबीर, राम कृष्ण से कौन बड़ा, उन्हांे भी गुरु कीन्ह।
तीन लोक के वे धनी, गुरु आगे आधीन।।7।।

Kabir Sahib says that you consider Ram and Krishan to be superior but they also made Guru. They were the master of 3 loks (3 worlds - Swarg, Pataal and Prithvi) but in front of a Guru they were humble.
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Aisa Ram Kabir ne Jaana

ऐसा राम कबीर ने जाना। धर्मदास सुनियो दै काना।।
सुन्न के परे पुरुष को धामा। तहँ साहब है आदि अनामा।।

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Controlling Mind and Lust

गरीब, कुरंग, मतंग, पतंग, श्रंग और भ्ररंगा।
इन्द्री एक ठग्यो तिस अंगा।।

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Ramaini - रमैनी

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Kabir Vani on Vegetarian

Kabir Sahib

God Kabir has very openly urged for all to be vegetarians

नबी मुहम्मद नमस्कार है, राम रसूल कहाया।
एक लाख अस्सी कूं सौगंध, जिन नहीं करद चलाया।।

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Paanch Naam of Kaal - संतो शब्दई शब्द बखाना

संतो शब्दई शब्द बखाना।।टेक।। शब्द फांस फँसा सब कोई शब्द नहीं पहचाना।।

प्रथमहिं ब्रह्म स्वं इच्छा ते पांचै शब्द उचारा।
सोहं, निरंजन, रंरकार, शक्ति और ओंकारा।।

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The Trap of Kaal - कर नैनों दीदार

कर नैनों दीदार महलमें प्यारा है।।टेक।।
काम क्रोध मद लोभ बिसारो, शील सँतोष क्षमा सत धारो।

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Kabir Vani on Pilgrimage - दुनियां अजब दिवानी

Kabir Sahib

दुनिया अजब दिवानी, मोरी कही एक न मानी।।टेक।।
तजि प्रत्यक्ष सतगुरु परमेश्वर, इत उत फिरत भुलानी।।
तीरथ मूरति पूजत डोले, कंकर पत्थर पानी।।1।।

विषय वासनाके फन्दे परि, मोहजाल उरझानी।।
सुखको दुख दुखको सुख माने, हित अनहित नहिं जानी।।2।।

औरनको मूरख ठहरावत, आप बनत है सयानी।।
साँच कहौं तौ मारन धावे, झूठेको पतियानी।।3।।

तीन गुणों की करत उपासना, भ्रमित फिरें अज्ञानी।
गीता कहे इन्हें मत पूजो, पूर्ण ब्रह्म पिछानी।।4।।
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